एक पेशे की कई कथाएं

एक पेशे की कई कथाएं

अनिशाबाद के अलीनगर कॉलोनी में, तेज़ कड़कड़ती धूप और भीषण गर्मी मे  मोहम्म्द इमरान अंसारी अपनी सिलाई मशीन लेकर  एक छोटा सा दुकान पर बैठा , कपड़े सिल रहा है । उसके  साथ अपने सपने भी  सिल रहा है । एक ही ख़्वाहिश है उनका की  वो  अपने बच्चे  को कामयाब पुलिस अफ़सर बनाये  ताकि कल उसका जीवन खुशियों से भरा रहे ।

वही मोहम्मद शहजाद ने घर ख़र्च चलाने के लिए बहुत से काम किए । जैसे – मिस्त्री ,प्लंबर, एलेक्ट्रियन का भी काम किया । अब वो अनिशाबाद के हारून कॉलोनी मे एक छोटी सी दुकान मे सिलाई कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते  है । उन्होने सिलाई करना अपने पिछले कार्यौ के दौरान सिखा । पिछले बारह सालों से वो सिलाई कर अपना और अपने परिवार का  जीवन व्यापन कर रहे है । सभी का ख्याल भी रख रहे है ।

इजराइल शाह

वही दूसरी ओर दीघा के 60 वर्षीय इसराइल शाह की कहानी कुछ अलग है। वो सिलाई कर अपने परिवार को तो चलते ही है और अपने बच्चो को शिक्षा भी देना चाहते है । उनकी आर्थिक स्थिति की वजह से वह अपने तीनो बच्चो को शिक्षा नहीं दे पाए । इसका अफ़सोस उन्हें अब तक है। इसलिए वह अपने सबसे छोटे बेटे को बढ़िया शिक्षा देने की पूरी कोशिश कर रहे है । उसे बी-टेक की पढाई करवा के इंजीनियर बनाना चाहते है। वो अपनी बेटियों की शादी करवा चुके है । उनके दोनों बड़े बेटे  ड्राइवर है। अगर उनके दोनों बेटों अपने छोटे भाई का खर्च उठा लेते है। तो उनकी तमन्ना  पूरी हो जायेगी।

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सकील अहमद कहते है कि -काम का उम्र से कोई मतलब नही होता क्यूकि काम सिर्फ पैसे के लिए नहीं  किया जाता, संतोष और खुशी के लिए भी किया जाता है। वे अपने  75 वर्ष की आयु में अपने संतोष और ख़ुशी के लिए आज भी अपने बच्चो पर निर्भर होने के बजाय खुद दीघा के मार्केट में बैठ कर सिलाई से अपना खर्च खुद उठाते है । उनकी दिन भर की कमाई  200 से 250 रुपये है। वो अपना जीवन स्वाभिमानी व्यक्ति कि तरह बिता रहे है।

वही गनौहरी राय अपनी खानदानी पेशे को आगे बढ़ा रहे है। वह कहते है कि बच्चे वही सीखते है जो वो देखते है। वह उनके आचरण का एक हिस्सा बन जाता है । चाहे वह बात करने का तरीका हो या कुछ काम करने का । राय ने सिलाई करना अपने दादा और पिता से सीखा है। अब उनके बच्चे भी यही करते है । वह बताते है कि उनका खानदानी पेशा  पिछले 60 वर्षो से है और अब भी वह यही काम कर रहे है।

कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता यह बात हमने  सड़क किनारे बैठे टेलर से सीखी। अक्सर हम उन्हे नज़रअंदाज़ कर देते है लेकिन यह कतई नकारा नहीं जा सकता की वो हमारे   सबसे बड़े सहायक होते है । जब हमे अपने कपड़े सिलाने होते है या  कपड़े मे जब भी  कुछ मामूली बदलाव लाने होते है । ये कपड़े मे बदलाव भी लाते है और हमारा समय भी बचाते है; साथ ही साथ किफायती दाम मे सही वक्त पर हमारा काम कर देते है।

 

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उज्जवल कुमार सिन्हा

बी.एम.सी

संत . ज़ेवियर कॉलेज मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी ,दीघा ,पटना

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