बिहार मे क्रिकेटरो की जागी नई उम्मीद

बिहार मे क्रिकेटरो की जागी नई उम्मीद

बिहार मे 18 साल बाद क्रिकेट का वनवास खत्म हो गया । जो की बिहार की क्रिकेटरो के लिए हर्षो उल्लास की खबर है। बिहार को रणजी खेलने की खबर मिलने के बाद यहाँ के क्रिकेटरो मे मानो की खुशी की लहर दौड़ पड़ी है ।

सन 2000 मे झारखंड के बनने के बाद बिहार ने पूर्ण रूप से BCCI की अपनी सदस्यता खो दी और मतदान का अधिकार भी गंवा दिया। जिससे बिहार की रणजी टीम को घरेलू मैचो मे जगह  मिलना बंद हो गया ।

इन 18 सालो मे बिहार ने न जाने कितने महेंद्र सिंह धोनी खोये होगे । ऐसा कहा जाता है कि बिहार प्रतिभा का राज्य है पर जब मान्यता ही नहीं तो प्रतिभा का क्या मोल ।  पिछले 18 सालो मे बिहार का क्रिकेट मानो जैसे विलुप्त सा हो गया हो । इन 18 सालो मे न जाने कितने खिलाड़ियो ने अपने सपनो को  बिखरते देखा है।

file photo for representation purposes only

इन 18 सालो मे खिलाड़ी खेले तो ज़रूर मगर उन्हे कुछ हासिल नहीं हुआ । कुछ खिलाड़ी अपने राज्य को छोड़कर दूसरे राज्यों मे जाकर खेले । ईशान किशन ,अनुकूल रॉय जैसे खिलाड़ियो को दूसरे राज्य के लिए खेलना पड़ा । इन 18 सालो मे बिहार कि स्थिति बद से बदतर होती चली गयी।

अब 18 साल के बाद जब बीसीसीआई ने बिहार को रणजी खेलने कि मंजूरी दी , तब से बिहार के क्रिकेटरो मे एक नई उम्मीद जागी है , कुछ करने  को।

SEE ALSO  प्लास्टिक के कचरे से बन रहा क्रूड ऑइल

अब धीरे –धीरे  बिहार मे क्रिकेट की स्थिति मे सुधार होने लगा है । बिहार मे अब अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियो की एकेड़मी खुलने लगे। हाल मे ही बिहार के खिलाड़ियो को बेहतर प्रशिक्षण देने के लिए महेंद्र सिंह धोनी और युसुफ पठान ने अपने एकेड़मी का उद्धाटन किया । इन क्रिकेटरो को एकेड़मी खोलने से खिलाड़ियो को वही सुख सुविधा मिल रही है जो अन्य राज्यों के खिलाड़ियो को मिलती है।

एक खिलाड़ी के तौर पर यह जान के खुशी होती है कि बिहार के खिलाड़ी भी दूसरे राज्य के खिलाड़ियो के सामने कंधे से कंधा मिलकर अब खेलेगे।

बिहार को रणजी खेलने की मान्यता मिलने से उन खिलाड़ियो के लिए बेहतर विकल्प का मौका बन गया  है । जो  क्रिकेट मे अपना कैरियर और भविष्य बनाना चाहते है।

 

उज्जवल कुमार सिन्हा

संत . ज़ेवियर्स कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी

Leave a Reply

Your email address will not be published.