नहीं पूरी हुई दलितो की मांग तो करेंगे चुनाव का बहिष्कार

नहीं पूरी हुई दलितो की मांग तो करेंगे चुनाव का बहिष्कार

आवास की वैकल्पिक व्यवस्था के बगैर सड़क, रेलवे मार्ग, तटबंध, शमशान मे बसे लोगो को अपने घरो से बेदखल कर दिया जाना, निःसन्देह मानवाधिकार का उल्लंघन है वासभूमि स्वामित्व कानून निर्माण सम्मेलन मे शामिल प्रतिनिधियों ने प्रतिभागियो को संबोधित करते हुये कहा।  

आजादी के 71 सालों के बाद भी आबादी का बड़ा भाग जीवन की सबसे बुनियादी जरूरतों मे शामिल वास की भूमि से वंचित रह गयी है। उन्हे सामाजिक तिरस्कार का भी  सामना करना पड़ रहा है। जो किसी भी दृष्टिकोण से मानवीय नहीं कहा जा सकता है।

बिहार की आबादी मे बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे लोगो का है जिसके सर पर एक छत  के लिए भूमि नही है। बिहार मे अनुसूचित जाती एवं जनजाति की 65.55 प्रतिशत आबादी है। जिनमे 1 करोड़ 16 लाख 52 हजार 296 परिवारों के पास जमीन नही है। गैर सरकारी आकड़ों के अनुसार आवासीय गृहविहीन परिवारों की बिहार मे संख्या 35 लाख है।

प्रतिनिधियों के मुताबिक भूमि सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय रहा है। बिहार मे सामाजिक न्याय के साथ विकास की सरकार बीते तीस सालों से रही है, किन्तु इन भूमिहीनों को आत्म सम्मान के बजाय सरकार से हिरकत मिली है। लाखो की तादाद मे सरकार से महज वासभूमि के लिए नारे लगेते हुए प्रखंड से लेकर राजधानी की सड़कों पर इन्हे देखा जा सकता है । इन आवासीय भूमिहीनों को कभी अतिक्रमण के नाम पर तो कभी साफ-सफाई के नाम पर हटाने का प्रयास होता रहता है।

SEE ALSO  St. Xavier's Colleges celebrate empowered women on Annual Day

बिहार सरकार आवासीय भूमि अधिकार अधिनियम 201 9 के तहत सभी ग्रामीण गरीब परिवारों को कम से कम 10 डिसमिल भूमि का अधिकार देता है। नियमानुसार यह अधिकार समय सीमा बद्ध तरीके से जवाबदेही पूर्वक एक निश्चित समय सीमा मे पूरे किए जाने पे भी बल देता है। गौरतलब है की देश की आजादी के बाद बिहार भूमि सुधार कानून बनाने वाला पहला राज्य है । अनेक कानून भी बनाए गए लेकिन सामाजिक भेद-भाव एवं छूआ-छूत से पीड़ित अभिवंचित समुदाय के गरीब एवं खेतीहर मजदूरों के लिए आज तक कानून नहीं बनाया गया।

असमान भूस्वामित्व की वजह से महिला, दलित, आदिवासी एवं समाज के अन्य पिछड़े समुदायों को भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। माननीय सवौच्च न्यायालय ने अपने आदेशो मे यह रेखांकित किया है की किसी भी व्यक्ति के सर पर छत होना उसका मानव अधिकार है। यह व्यक्ति का मूलभूत अधिकार है जो उसके सम्मान के साथ जीवन जीने की परिस्थिति का निर्माण करता है। बिहार सरकार भी यह स्वीकार करती है। सरकार यह मानती है की मकान एवं खाद्य सुरक्षा के लिए भूमि का होना जरूरी है। भारतीय संविधान भी पहचान एवं आत्मसम्मान से जीवन जीने की गारंटी देता है।

10 मार्च को दलित अधिकार मंच द्वारा स्थानीय मिलर विधालय, विरचन्द्र पटेल पथ, पटना मे “वासभूमि स्वामित्व कानून निर्माण के लिए छठा राज्य स्तरीय सम्मेलन” का आयोजन किया गया। सम्मेलन मे बिहार के विभिन्न जिलो के सामाजिक संगठनो के प्रतिनिधियों मे  मुख्य अतिथि मानव अधिकार कार्यकर्ता संदीप चाचरा, प्रदेश अध्यक्ष श्री कपिलेश्वर राम, संचालक कर्ता सौरभ कुमार, महा सचिव दीपचंद दास, वरिष्ठ सदस्य सुमित्रा जी, राज्य संचालक विनय ओहदार, भोजन का अधिकार से रूपेश जी , एकता परिषद से प्रदीप प्रियदर्शी, असंगठित क्षेत्र कामगार संगठन के पंकज स्वेताभ, बिहार दलित विकास समिति के फादर अन्तो, विधसागर, योगेंद्र नारायण, धनंजय जी , विमला जी , डॉ. शरद जी एवं अन्य गणमान्य लोग मौजूद थे

SEE ALSO  Patna airport getting ready to accommodate Helicopters and Private Choppers

दलित अधिकार मंच की मांग

  1. राज्य मे वास की भूमि स्वामित्व कानून बनाए जाए।
  2. भूदान एवं सीलिंग की जमीन की समीक्षा कर शेष जमीन दलित भूमिहीनों को वितरित की जाए।
  3. सभी जमीनों का मालिकाना अधिकार परिवार के वयस्क महिला सदस्य के नाम पर दी जाए।
  4. दलित एवं आदिवासियों पर होनेवाले अत्याचारों की घटनाओ पर प्रभावी ढंग से रोक लगायी जाए।
  5. SCSP/TSP के तहत प्राप्त होनेवाले निधि को कानून बना कर इसके नियोजक, आवंटन तथा सही इस्तेमाल की रूप-रेखा बनाई जाए।

सम्मेलन मे उपस्थित प्रतिनिधियों एवं प्रतिभागियो ने माग न पूरी होने पर वोट न देने की धमकी दी।  

Leave a Reply

Your email address will not be published.