क्या पेट भरते ही इंसान अपनी औकात भुल जाता है?

क्या पेट भरते ही इंसान अपनी औकात भुल जाता है?

हम एक ऐसे समाज में रहते हैं, जहाँ पर्यावरण, सड़क को गन्दा करने वाले, कचरा फैलने वाले को सलाम करते है वही जो पर्यावरण को साफ करते है बगैर अपनी सेहत की चिंता किये, उसकी निंदा करते है उनसे दूर भागते हैं।

समाज के ऐसे कुछ वर्गो के लोग जो अपना घर चलाने के लिए सिर्फ बड़ों को ही नहीं बल्कि बच्चों को भी पढ़ाई छोर कर कचरा चुनने पर मजबूर होते हैं, किसी के लिए यह पेट भरने का जरिया है तो किसी के लिए पैसे कमा कर घर चलाने का।
5-6 साल के मासूम बच्चे जिनकी उम्र पढ़ने की थी, वो कचरे के ढेर पर अपने लिए रोटी ढूंढ रहे तो कही कोई खिलवना। ऐसे लग रहा था मानो वो बच्चे “कड़े मे कनक की तलाश कर रहे हो”।
ललता देवी बताती है कि उन्हें कचरा चुनने में कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उनका कहना है की “हमलोग पढ़े नहीं होते है लेकिन और सभी तो पढ़े होते है न उनको खुद सोचना चाहिए की कचरा अलग- अलग फेके” और जोड़ते हूए कहती है की “हमें कॉपी, सीसा, सुई, प्लास्टिक सभी अलग अलग करके छाटना परता है और मौसम की परवाह किए बिना हमें पुरे दिन काम करना परता है”।

कड़ी मेहनत के बाद ललता देवी 150-200 कमा लेती है, इनके परिवार मे छह लोग है, सभी इसी कार्य से जुड़े हैं । आगे ये भी बताती है कि- हाथ कट जाए, सीसा चुभ जाए, हॉस्पिटल का बेकार सुई कभी- कभी लग जाती है, जिससे उनलोगों को टेटनस, टी वी इत्यादि का खतरा बना रह्ता है।
चार बच्चों की मां होने के नाते कहती है कि-” मैं भी चाहती थी मेरे बच्चे स्कूल जाए पढ़ाई करे मगर पैसे की मंदी के कारन हमें अपने बच्चों को मजबूरन कचरा चुनने के लिए भेजना परता है और सरकार भी हमारे उपर कुछ ध्यान नहीं देती”।

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19 वर्षीय सोनू कुमार बचपन से यह कार्य कर रहे है, प्रतिदिन रु 200-400 कमा लेते है लेकिन यह कचरा और कबाड़ी वाला पर निर्भर करता है। वह बताते है की कचरा चुन कर पास के ही कबाड़ी दुकान मे बेच देते है जिससे 1-2 दिन के घर का समान आ जाता है।

सोनू के परिवार में 8 सदस्य हैं माता-पिताऔर 5 बहनें और वह बताता है की पिता मील मे काम करते है लेकिन घर उससे नही चल पाता है इसलिए “मुझे पढ़ने का बहुत शौक था लेकिन घर का बेटा होने के कारन माता-पिता की मदद के लिए बचपन से यह काम कर रहा हूं”।
सभी के परिवार एक जैसे नहीं होते हैं, कुछ इतने मजबूर होते हैं कि वह चाह कर भी अपने बच्चों को नही पढ़ा सकते है ।

रवि कुमार कचरा बचने का काम 13-14 वर्षो से कर रहे हैं । रु 150-300 का कमाई प्रतिदिन कर लेते है अपने परिवार को चलाने के लिए। इनका कहना है कि ” जब स्कूल जाते बच्चों को देखतेदेखते है तो मेरा भी बहुत मन करता है स्कूल जाने का हम पढ़ कर बड़ा आदमी बनना चाहते थे लेकिन घर के हालात के कारन मुझे यह काम करना परता है और जरुरी नही की अब भी कचरा चुनने वाले का बेटा भी कचरा ही चुने” आगे कहते हैं कि “सरकार भी कुछ नही करती हमारे पढ़ाई के लिए ना ही स्वस्थ के लिए ना कभी सोचती है”।
ये वो आम आदमी जो अपने जीवन के असली हीरो है, जो भीख मागने के बजाए अपनी कड़ी मेहनत से अपना घर चलाते हैं। हम सभी को इनसे सिखना चाहिए कैसे पर्यावरण को साफ रखते है और जरुरत कैसे लोगों से मेहनत करवाती हैं। इनसे घृणा के बजाए हमें इनका सम्मान करना चाहिए।

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नेहा निधि

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