अब बचपन मोबाइल फोन तक ही सीमित

अब बचपन मोबाइल फोन तक ही सीमित

महोदय

अब वो शाम कहाँ, वो बचपन की शैतानियाँ कहाँ, स्कूल जाने की मजबूरी और खेलने के लिए सुबह से शाम की दूरी। वक़्त बदलने लगा है, अब बच्चों की नादानी, बच्चो का बचपना खो सा गया है और ना ही मासूमियत बची है। सुबह से शाम हो जाते हैं और आराम-हराम हो जाता हैं, बचपन से ही टेंशन बस पढ़ाई पे ही एटेन्शन। अब तो बस स्कूल से घर और घर से स्कूल, बस्ते की बोझ और हर समय मोबाइल की खोज ही रह गई है।

हाल ही में मैं ऑटो रिक्शा से सफर कर रही थी तो मेरे ठीक सामने एक बच्ची बैठी थी लगभग एक-डेढ़ साल की रही होगी और उसने जैसे ही रोना शुरू किया उस बच्चे के पिता ने उसे मोबाइल फोन पकड़ा दी और वो बच्ची एकदम चुप हो गई।

बच्चो में मोबाइल फोन की लत सी लग गई, बच्चे अगर किसी चीज़ के लिए भी ज़िद कर रहें या फिर कोई छोटा बच्चा रो रहा हो या परेशान कर रहा हो तो माता-पिता उसे फोन पकड़ा देते हैं और वो बच्चा एकदम चुप हो जाता है। माता- पिता के लिए मोबाइल बच्चों को शांत करने का एक हथियार सा बन गया है।

मोबाइल फोन की लत ने बच्चे को काफी कनसरवेटिव बना दिया हैं और वो बाहर घुलना मिलना और घर के बाहर खेले जाने वाला खेल नहीं खेलते हैं, जिससे उनका शारीरिक विकास और मानसिक विकास भी सही तरीके से नहीं हो पा रहा है। बच्चे अब टेक्नालजी से इतने घिर चुके हैं की बाहरी दुनिया से उनका ताल्लुक खतम सा हो गया है। अब तो बस स्कूल से घर और अपने कमरे तक ही सीमित रह गई है इनकी दुनिया।

मोबाइल फोन बच्चों की ज़िंदगी का एक बहुत ही अहम हिस्सा बन गया है, चाहे वो किसी भी उम्र के क्यूँ ना हो। अब बच्चे बाहर जा कर खेलने से ज्यादा मोबाइल फोन देखना पसंद करते हैं। शाम की हुरदंग, खेलकुद, साइकल ले कर निकल जाना , क्रिकेट, पकड़म-पकड़ाई और कित-कित, अब तो गुम सा गया है।

 वो कहते हैं ना की एक बच्चा कच्ची मिट्टी के समान होता है इसे जैसा भी आकार दिया जाये वैसा ही बन जाता है, तो बच्चे को बचपन से जैसा माहौल , जैसी आदत लगाई जाएगी वह वैसा ही सीखेगा। तो बचपन से हीं मोबाइल फोन दे देने से बच्चो को आदत हो गई है और इसमे कहीं न कहीं सारी गलती माता-पिता की है जिसकी वजह से अब बचपन खो गया है।   

आस्था कश्यप

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