क्या 6000 रु किसानों का समस्याओं को हल करेगा ?

क्या 6000 रु किसानों का समस्याओं को हल करेगा ?

NDA (या मोदी सरकार) ने अपने दूसरे कार्यकाल की पहली कैबिनेट मीटिंग में फ़ैसला लिया कि किसान सम्मान निधि योजना के तहत अब सभी किसानों को सालाना 6,000 रुपये मिलेंगे।  साथ ही किसानों के लिए पेंशन योजना का ऐलान भी किया।

मीडिया के अनुमान है की बीजेपी ने अपने चुनाव संकल्प पत्र में इस योजना में सभी किसानों को शामिल करने का वादा किया था, और इसे पहली ही कैबिनेट मीटिंग में मुहर लगाई गई।

लेकिन क्या 6000 रूपये और पेंशन किसानों की मौजूदा स्थिति में सुधार लाएगा? कृषि संकट का समाधान, किसानों की पैदावार और उनके आर्थिक हालात को बेहतर बनाना  भारत सरकार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं।

विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों की राय है कि कृषि संकट इतना विकराल रूप धारण कर चुका है उसमें सुधार के लिए सरकार को तुरंत उपाय सोचने होंगे।

नीति आयोग ने भी माना है कि पिछले दो साल यानी 2017-18 में किसानों की आय में वास्तविक बढ़ोतरी लगभग शून्य हुई है।  उसके पिछले पांच सालों में देखें तो नीति आयोग का मानना है कि उस दौरान किसानों की आय में हर साल आधा प्रतिशत से भी कम बढ़ोतरी हुई है।  यानी सात सालों से किसानों की आय में वृद्धि न के बराबर हुई है।  तो इसका मतलब खेती का संकट बहुत गहरा है।

जल संकट सबसे बड़ी समस्या: देश में किसानों की स्थिति सुधारने के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत है कि इंफ्रास्ट्रक्चर में खर्च किया जाना चाहिए।

पानी की समस्या कितनी विकराल रूप ले रही है इस पर छत्तीसगढ़ में किसानी कर रहे आशुतोष मीडिया से कहा  “जल संकट सबसे बड़ी समस्या है।  फ़सल को पानी चाहिये लेकिन इसकी उपलब्धता मॉनसून पर निर्भर है।  बीज पर कब बोयें इसकी निर्भरता मॉनसून पर है।  तमाम दावों के बावजूद अभी तक सिंचाई की वैसी व्यवस्था नहीं हो सकी है जैसा कि एक किसान को चाहिए।  फ़सल को जिस दिन पानी की ज़रूरत है वो उस दिन उसे उपलब्ध नहीं हो पाती।  ज़मीन में पानी का स्तर (वाटर लेवल) बहुत नीचे जा रहा है।  समुचित पानी नहीं मिल पाने से किसान की पैदावार पर और उसकी कमाई पर इसका असर दिखता है।“

नए कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि पानी की समस्या का समाधान कैसे किया जाये।

पानी की कमी पर ध्यान देने की ज़रूरत है।  सरकार को चाहिए कि वो लॉन्ग टर्म योजनाएं बनाए।  पानी बचाने, उसके बेहतर उपयोग करने और साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करना जरूरी है।  किसानों के पास पानी कितना पहुंचा है इसका डेटा रिलीज किया जाना चाहिए।  इससे ज़्यादा लोग रिसर्च कर सकेंगे और इससे सरकार की नीतियां बेहतर हो सकेंगी।  सिंचाई के अलावा कृषि सुधारों की दिशा में वर्ष 1995 में लागू किये गये आवश्यक वस्तु अधिनियम में आमूल संशोधन की ज़रूरत है  बाज़ार में कोल्ड स्टोरेज में निवेश की ज़रूरत है।

भूमिहीन कृषक और महिला किसान : बिहार में मक़ाम या महिला किसान मोर्चा  के सदस्यों का कहना है की भारत सरकार और राज्य सरकार महिला किसानों को मान्यता नहीं देते । “लिंग भेदभाव हमारे नीतियोइन मे है। जहां महिलाओं खेतों में ज्यादा से ज्यादा काम करते हैं, वहाँ, उनके नाम में न तो जमीन है और न ही सरकारी कृषक स्कीम का वे लाभ उठा सकते हैं।,” मक़ाम से कीर्ति कहती है।

दूसरा प्राशन है की बिहार में अधिकतार कृषि का काम भूमिहीन कृषक करते हैं। “वे ही बीज और खाद में निवेश कटे हैं। फसल नष्ट होने का नुकसान वे उठाते है। लेकिन जमीन धारक जो एक अमीर आदमी होता है , उसके नाम में किसान के लिए योजना होता है,” ऐसा कहता है समाज सेवी और दलित समाज का चिंतक कपिलेश्वर राम।

नहीं मिलती फ़सल की सही कीमत: ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक 2000-2017 के बीच में किसानों को 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ क्योंकि उ उनकी फ़सलों का समुचित मूल्य नहीं मिला.

Cultivators have a hard life in India
कृषक का जीवन भारत में कठीण है ।

छत्तीसगढ़ में आशुतोष बताया  “एक किसान के रूप में अच्छे बाज़ार की ज़रूरत होती है. किसान को उसकी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पाता.”

कृषि विशेषज्ञ कहते है कि कई दशकों से  भारत के आर्थिक नीतियाँ पर वर्ल्ड बैंक, IMF और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की आर्थिक सोच के अधीन  रहे और उन नीतियों को व्यावहारिक बनाने के लिए कृषि को हाशिये पर (marginalized) रखा जा रहा था।

उसके दो कारण हैं- महंगाई को नियंत्रण में रखना और उद्योग को कच्चा माल सस्ते में उपलब्ध कराना।  तो इन दो कारणों को पाने के लिए किसानों को जानबूझ कर ग़रीब रखा गया।  कहीं भी हमारे देश में यह नहीं सोचा गया कि उसके हक़ के हिसाब से उसकी आय बढ़नी चाहिए।  किसान कर्ज़ लेता है और उसके बोझ तले दब जाता है, आत्महत्या के लिए मजबूर होता है।  इसी आर्थिक डिजाइन को तोड़ना पड़ेगा। “

इकोनॉमिक स्टेटस की बात करें तो ऑक्सफैम की रिपोर्ट कहती है कि 73 फ़ीसदी दौलत देश के 1 फ़ीसदी लोगों के पास ह। यानी स्थिति यह है कि अमीर और अमीर जबकि ग़रीब और ग़रीब होता जा रहा है।

वहीं 2016 के आर्थिक सर्वे में किसान परिवार की 17 राज्यों में आय 20 हज़ार रुपये सालाना से कम है यानी 1,700 रुपये मासिक या लगभग 50 रुपये दैनिक।  सवाल है कि इस आय में कोई परिवार कैसे पलता होगा?

छत्तीसगढ़ के शिक्षित किसान आशुतोष भी कहते हैं, “छोटे किसानों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव भी एक बहुत बड़ी समस्या है।  गांव तक जो सड़क की पहुंच बहुत अच्छी नहीं होती है।  जैसे कि अपने खेत से फ़सल निकालना है और बारिश हो गयी तो आप उस दिन उसे नहीं निकाल सकत। .”

वहीं देवेंद्र शर्मा कहते हैं, “खेती में पैसा नहीं है, उसके मजदूरों के पास काम नहीं है।  चुनाव के नतीजे आने के बाद से देश में एक माहौल सा बनाया जा रहा है कि सरकार आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करेगी क्योंकि जीडीपी ग्रोथ 6 प्रतिशत से भी कम पर आ गयी है।  निवेश बढ़ाये जाने की बात चल रही है।  कहा जा रहा है कि जीडीपी ग्रोथ को आगे बढ़ाने से रोज़गार बढ़ेगा।  निवेश निजी क्षेत्र में आना चाहिए।  वो ही सब जो पूरी दुनिया में विफल रहा है उसकी बात एक बार फिर की जा रही है, जैसे कि देश के सामने कोई विकल्प नहीं है। “

यह सिर्फ कृषि मंत्री का समस्या नहीं है, सभी मंत्रिमंडल को मिलकर किसान के विकास के लिए कदम उठाना होगा ।  

(based on media reports by BBC)

यह सिर्फ कृषि मंत्री का समस्या नहीं है, सभी मंत्रिमंडल को मिलकर किसान के विकास के लिए कदम उठाना होगा ।

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